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सोमवार, ५ जून, २०२३

संपूर्ण महागाथा मराठाशाहीची भाग ९९

 

संपूर्ण महागाथा मराठाशाहीची
संग्राहक ::विनोद जाधव

भाग ९९
सातवाहन वंश के शासक (हिंदी माहिती )--------३
हाल (20 ई0पू0 - 24 ई0पू0)
हाल सातवाहनों का अगला महत्पूर्ण शासक था। यद्यपि उसने केवल चार वर्ष ही शासन किया तथापि कुछ विषयों उसका शासन काल बहुत महत्वपूर्ण रहा। ऐसा माना जाता है कि यदि आरम्भिक सातवाहन शासकों में शातकर्णी प्रथम योद्धा के रूप में सबसे महान था तो हाल शांतिदूत के रूप में अग्रणी था। हाल साहित्यिक अभिरूचि भी रखता था तथा एक कवि सम्राट के रूप में प्रख्यात हुआ। उसके नाम का उल्लेख पुराण, लीलावती, सप्तशती, अभिधान चिन्तामणि आदि ग्रन्थों में हुआ है। यह माना जाता है कि प्राकृत भाषा में लिखी गाथा सप्तशती अथवा सतसई (सात सौ श्लोकों से पूर्ण) का रचियता हाल ही था। बृहदकथा के लेखक गुणाढ्य भी हाल का समकालीन था तथा कदाचित पैशाची भाषा में लिखी इस पुस्तक की रचना उसने हाल ही के संरक्षण में की थी। कालानतर में बुद्धस्वामी की बृहदकथा'यलोक-संग्रह, क्षेमेन्द्र की बृहदकथा-मंजरी तथा सोमदेव की कथासरितसागर नामक तीन ग्रन्थों की उत्पति गुणाढ्य की बृहदकथा से ही हुई।
हाल के प्रधान सेनापति विजयानन्द ने अपने स्वामी के आदेशानुसार श्रीलंका पर आक्रमण कर उसे जीत लिया। इस विजय अभियान से वापिस लौटते समय वह कुछ समय के लिये सप्त गोदावरी भीमम् नामक स्थान पर रूका। वहाँ विजयानन्द ने श्रीलंका के राजा की अति रूपवान पुत्री लीलावती की चर्चा सुनी जिसका वर्णन उसने अपने राजा हाल से किया। हाल ने प्रयास कर लीलावती से विवाह कर लिया। किवदंती है कि हाल ने पूर्वी दक्कन में कुछ सैनिक अभियान किये परन्तु साक्ष्यों के अभाव में अधिकतर विद्वान इसे गलत मानते हैं। यद्यपि हाल तक के सातवाहन शासकों के शासनकाल में राजनैतिक क्षेत्र के अतिरिक्त साहित्यिक तथा आर्थिक क्षेत्रों में भी अत्याधिक विकास हुआ तथा व्यपार-वाणिज्य शहरों के विकास एवं जलपरिवहन की उन्नति हुई जो कि प्रथम शताब्दी ई0 के दूसरे मुण्डलक अथवा पुरिद्रंसेन के शासन काल में अपने उत्कर्ष की पराकाष्ठा पर पहुँच गई, तथापि आने वाले लगभग पचास वर्ष सातवाहन साम्राज्य के लिए बड़े ही कठिन साबित हुए। ऐसा प्रतीत हुआ मानो के पश्चिम क्षत्रपों के रूप में हुए विदेशी आक्रमण के साथ ही सातवाहन साम्राज्य का पतन होने को है। कुषाण उत्तर-पश्चिम में अपना प्रसार कर रहे थे तथा उनके दबाव में शक तथा पहलाव शासक मध्य तथा पश्चिमी भारत की ओर आकर्षित होकर सातवाहनों से संघर्ष करने को आतुर थे। क्षहरात वंश के पश्चिमी क्षत्रपों ने अपने को पश्चिमा राजपुताना, गुजरात तथा काठियावाड़ में स्थापित कर लिया था। इन शक शासकों ने 35 ई0 से लेकर लगभग 90ई0 तक सातवाहन राज्य पर आक्रमण किये। उन्होंने सातवाहनों से पूर्वी तथा पयिचमा मालवा प्रदेशों को जीता; उत्तरी कोंकण (अपरान्त) उत्तरी महाराष्ट्र, जो कि सातवाहन शक्ति का केन्द्र था तथा बनवासी (वैजयन्ती) तक फैले दक्षिणी महाराष्ट्र पर भी अपना प्रभुत्व जमा लिया। क्षहरात वंश का पहला शासक घूमक था जिसकी जानकारी के स्रोत कुछ सिक्कें है जो कि अधिकांशतः गुजरात काठियावाड़ के तटीय प्रदेश तथा यदाकदा मालवा से पाए हैं। घूमक का उत्तराधिकारी नहपान था जिसकी जानकारी हमें उसके बहुसंख्य सिक्कों पर राजा (अथवा राजन्) की उपाधि धारण की है। वहीं शिलालेखों उसकी उपाधि क्षत्रप तथा महाक्षत्रप मिली। नासिक, कारले तथा जुनार (उत्तरी महाराष्ट्र) के उसके शिलालेख; एसके बहुसंख्य सिक्कें तथा उसके जामाता शक अशवदात के द्वारा उत्तरी तथा दक्षिणी भारत में दिए गए दान सब के सब ये प्रमाणित करते हैं कि नहपान के समय में क्षहरात वंश का साम्राज्य काफी विस्तुत था तथा उसने सातवाहन शासकों से काफी बड़ा प्रदेश छीन कर ही अपने साम्राज्य को इतना विशाल बनाया था। नहपान तथा उसके जामाता शक अशवदत ने मालवा, नर्मदा घाटी, उत्तरी कोंकण, बरार का पश्चिमा भाग एवं और दक्षिणी महाराष्ट्र को जीतकर पश्चिमी दक्कन में सातवाहन शक्ति को ल्रभ्र उखाड़ फैंका। वे सातवाहन राजा जो नहपान के हाथों पराजित हुए कदाचित सुन्दर शातकर्णी, चकोर शातकर्णी तथा शिवसाती थे जिनका कि कार्यकाल बहुत ही छोटा था (इनमें से पहले दो का शासन काल मात्रा डेढ़ वर्ष था) परन्तु यह परिस्थितियां अधिक समय तक नही चली तथा गौतमी पुत्र श्री शातकर्णी के सातवाहन शासक बनते ही इस क्षहरात-सातवाहन संघर्ष में नया मोड़ आया।

संपूर्ण महागाथा मराठाशाहीची भाग ९८

 

संपूर्ण महागाथा मराठाशाहीची
संग्राहक ::विनोद जाधव

भाग ९८
सातवाहन वंश के शासक (हिंदी माहिती )--------२
वेदश्री तथा सतश्री (अथवा शक्ति श्री)
शातकर्णी प्रथम की मृत्यु के पश्चात उसके दो अल्पव्यस्क पुत्र वेदश्री तथा सतश्री सिंहासन पर बैठे। परन्तु अल्पव्यस्क होने के कारण प्रशासन की सारी बागडोर उनकी मां नयनिका के हाथों में आ गई जिसने अपने पिता की सहायता से शासन चलाया। ऐसा प्रतीत होता है कि वेदश्री की अल्पायु में ही मृत्यु हो गई तथा सतश्री ने उसके उत्तराधिकारी के रूप में शासन संभाला। परन्तु पुराण इस विषय में एकमत है कि शातकर्णी प्रथम के पश्चात् पूर्णोत्संग नामक राजा सातवाहन सिंहासन पर आसीन हुआ। चाहे चतुर्थ सातवाहन शासक का नाम कुछ भी रहा हो, यह तो निश्चित है कि इस शासक के शासन काल में ही पुष्यमित्र शुंग ने अंतिम मौर्य शासक ब्रहद्रथ को मार कर मगध राज्य पर अधिकार कर लिया था। मत्स्यपुराण में स्कन्दस्तम्भी का उल्लेख सातवाहन वंश के पाँचवें शासक के रूप में केया है परन्तु अधिकतर विद्वान इस नाम को कल्पित मानते हैं।
शातकर्णी द्वितिय
शातकर्णी द्वितिय ने लगभग 166 ई0पू0 से लेकर 111 ई0पू0 तक शासन किया। यह कदाचित वही शासक था जिसका वर्णन हीथीगुम्फा तथा भीलसा शिलालेखों में हुआ है। यह प्रतीत होता है कि इसके शासन काल में सातवाहनों ने पूर्वी मालवा को पुष्यमित्र शुंग के एक उत्तराधिकारी से छीन लिया।
पुराणों के अनुसार शातकर्णी द्वितिय के पश्चात् लम्बोदर राजसिंहासन पर आसीन हुआ। लम्बोदर के पश्चात् उसका पुत्र अपीलक गद्दी पर बैठा। अपीलक जो कि आठवाँ सातवाहन शासक था, इन दोनां के मध्य का काल सातवाहनों के सन्दर्भ में अंधकार युग माना गया है जिसमें केवल कुन्तल शातकर्णी के काल को ही अपवाद माना जा सकता है। कुन्तल शातकर्णी, अपीलक के पश्चात् सातवाहनों का अगला महत्वपूर्ण शासक था। कामसूत्र में वात्सायन ने कुन्तल शातकर्णी का उल्लेख करते हुए लिखा है कि उसने अपनी उंगलियों को कैंची के रूप में प्रयोग किया तथा इसके प्रहार से उसकी पटरानी मलयवती की मृत्यु हो गई। काव्यमिंमाशा में राजेश्वर ने कुनतल शातकर्णी का वर्णन करते हुए कहा है कि उसने अपने रनिवास में रहने वाली अपनी रानियों को यह आदेश दिया था कि वे केवल प्राकृत भाषा का प्रयोग करें।

संपूर्ण महागाथा मराठाशाहीची भाग ९७

 

संपूर्ण महागाथा मराठाशाहीची
संग्राहक ::विनोद जाधव



भाग ९७
सातवाहन वंश के शासक (हिंदी माहिती )--------१
सातवाहन प्राचीन भारत का एक राजवंश था। इसने ईसापूर्व 230 से लेकर दूसरी सदी (ईसा के बाद) तक केन्द्रीय दक्षिण भारत पर राज किया। यह मौर्य वंश के पतन के बाद शक्तिशाली हुआ था। इनका उल्लेख 8वीं सदी ईसापूर्व में मिलता है। अशोक की मृत्यु (सन् 232 ईसापूर्व) के बाद सातवाहनों ने खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया था। सीसे का सिक्का चलाने वाला पहला वंश सातवाहन वंश था, और वह सीसे का सिक्का रोम से लाया जाता था।
शासक
सिमुक
सिमुक (235 ई0पू0 - 212 ई0पू0) सातवाहन वंश का संस्थापक था तथा उसने 235 ई0पू0 से लेकर 212ई0पू0 तक लगभग 23 वर्षों तक शासन किया। यद्यपि उसके विषय में हमें अधिक जानकारी नही मिलती तथापि पुराणों से हमें यह ज्ञात होता है कि कण्व शासकों की शक्ति का नाश कर तथा बचे हुए शुंग मुखियाओं का दमन करके उसने सातवाहन वंश की नींव रखी। पुराणों में उसे सिमेक के अतिरिक्त शिशुक, सिन्धुक तथा शिप्रक आदि नामों से भी पुकारा गया है। जैन अनुश्रुतियों के अनुसार सिमुक ने अपने शासन काल में जैन तथा बौद्ध मन्दिरों का निर्माण करवाया, परन्तु अपने शासन काल के अन्तकाल में वह पथभ्रष्ट तथा क्रुर हो गया जिस कारणवश उसे पदच्युत कर उसकी हत्या कर दी।
कान्हा तथा कृष्ण (212ई0पू0 - 195ई0पू0)
सिमुक की मृत्यु के पश्चात उसका छोटा भाई कान्हा (कृष्ण) राजगद्दी पर बैठा। अपने 18 वर्षों के कार्यकाल में कान्हा ने साम्राज्य विसतार की नीति को अपनाया। नासिक के शिलालेख से यह पता चलता है कि कान्हा के समय में सातवाहन साम्राज्य पश्चिम में नासिक तक फैल गया था। शातकर्णी-प् (प्रथम) कान्हा के उपरान्त शातकर्णी प्रथम गद्दी पर बैठा। पुराणों के अनुसार वह कान्हा पुत्र था। परन्तु डॉ॰ गोपालचारी सिमुक को शातकर्णी प्रथम का पिता मानते हैं। कुछ विद्वानों ने यह माना है कि इसका शासन काल मात्रा दो वर्ष रहा परन्तु नीलकण्ठ शास्त्री ने उसका शासन काल 194 ई0पू0 से लेकर 185 ई0पू0 माना है। जो भी हो यह सुस्पष्ट है कि उसका शासन काल बहुत लम्बा नही था। परन्तु छोटा होते हुए भी शातकर्णी प्रथम का कार्यकाल कुछ दृष्टिकोणों से बड़ा महत्वपूर्ण है। सातवाहन शासकों में वह पहला था जिसने इस वंश के शासकों में प्रिय एवं प्रचलित, ''शातकर्णी'' शब्द से अपना नामकरण किया। नानाघाट शिलालेख के अनुसार शातकर्णी ने अपने साम्राज्य का खुब विस्तार किया तथा अपने कार्य काल में दो अश्वमेघ यज्ञ तथा एक राजसुय यज्ञ किया। उसकी रानी नयनिका के एक शिलालेख से हमें यह ज्ञात होता है कि शातकर्णी प्रथम ने पश्चिमी मालवा के साथ-साथ अनुप (नर्मदा घाटी का क्षेत्र) तथा विदर्भ (बरार) प्रदेशों भी जीत लिया। यदि शातकर्णी प्रथम ही वह शासक है जिसका उल्लेख सांची स्तूप के तोरण में हुआ है तो यह भी इस बात को प्रमाणित करता है कि उसके समय में मध्य भारत सातवाहनों के अधिकार में था। वह अपने छाटे से कार्य काल मे सम्राट बन गया तथा उसने दक्षिण पथपति तथा अप्रतिहत चक्र आदि उपाधियाँ धारण की। नानाघाट लेख तथा हाथी गुम्फा लेखों में प्रयुक्त लिपि की समानता के आधार पर ही यह सुझाया गया है कि कदाचित इसी शातकर्णी शासकों के शासन काल के दूसरे वर्ष में कलिंग के महान शासक खारखेल ने युद्ध क्षेत्र में हराया था। शातकर्णी प्रथम की पत्नी नयनिका अथवा नागनिका अंगीय कुल के एक महारथी त्रणकाइरो की पुत्री थी।

संपूर्ण महागाथा मराठाशाहीची भाग ९६

 

संपूर्ण महागाथा मराठाशाहीची
संग्राहक ::विनोद जाधव




भाग ९६
सिमुक सातवाहन ,हाल सातवाहन,मेघस्वाती
सिमुक हा सातवाहन साम्राज्याचा संस्थापक होय. याने इ.स.पू. २३० ते इ.स.पू. २०७ या कालखंडात प्रतिष्ठान व माळवा या प्रदेशांत राज्य केले. पुराणांमध्ये सिशुक, तसेच सिंधुक या नावांनीही याचे उल्लेख आढळतात[ संदर्भ हवा ].
सिमुकानंतर त्याचा भाऊ कृष्ण सत्तेवर (राज्यकाळ: इ.स.पू. २०७ - इ.स.पू. १८९) आला. कृष्णाच्या काळात सातवाहनांची सत्ता पश्चिमेस व दक्षिणेस विस्तारली.
हाल सातवाहन
हाल हा सातवाहन साम्राज्याचा सम्राट होता. मत्स्य पुराणानुसार हा सातवाहनांचा १७वा राजा होता[१]. याने इ.स. २० ते इ.स. २४ या कालखंडात राज्य केले. महाराष्ट्री प्राकृत भाषेतील गाहासत्तसई (गाथासप्तशती) नामक काव्यसंग्रहाचा हा रचनाकार असल्याचे मानले जाते
संदर्भ व नोंदी
रायचौधुरी, एच.पी. पॉलिटिकल हिस्टरी ऑफ एन्शियंट इंडिया (इंग्लिश भाषेत). p. ३६१.
मेघस्वाती
मेघस्वाती हा सातवाहन राजवंशातील राजा होता. याचा राज्यकाल इ.स.पू. ५५ ते इ.स.पू. ३७ पर्यंत होता.त्याचे एक नाणे आंध्र येथे सापडले आहे
संदर्भ आणि नोंदी

संपूर्ण महागाथा मराठाशाहीची भाग ९५

 

संपूर्ण महागाथा मराठाशाहीची
संग्राहक ::विनोद जाधव

भाग ९५
वासिष्ठीपुत्र पुलुमावी
वासिष्ठीपुत्र पुलुमावी (मराठी लेखनभेद: वासिष्ठीपुत्र पुलुमावि) हा सातवाहन सम्राट होता. हा सातवाहन सम्राट गौतमीपुत्र सातकर्णी याचा पुत्र होता. गौतमीपुत्र सातकर्णीनंतर इ.स. १३२ सालाच्या सुमारास हा सातवाहनांचा राजा झाला.
कारकीर्द
याच्या कारकिर्दीत क्षत्रपांनी उठाव करून नर्मदेच्या उत्तरेकडील भूप्रदेश व उत्तर कोकण जिंकून घेतले. वासिष्ठीपुत्र पुलुमावी आणि रूद्रदामन (उज्जैनचा क्षत्रप राजा) यांच्यात दोनदा युद्ध झाले. या दोन्ही युद्धांत रूद्रदामनाने वासिष्ठीपुत्र पुलुमावीचा पराभव केला. परंतु त्याची कन्या वासिष्ठीपुत्र सातकर्णीस (पुलुमावीचा धाकटा भाऊ) दिलेली असल्याने क्षत्रपांनी तडजोड करून घेतली. वासिष्ठीपुत्र पुलुमावीने स्वतःचा मुखवटा असलेली चांदीची नाणी प्रचारात आणली.
संकीर्ण
टॉलेमी या ग्रीक प्रवाशाने प्रतिष्ठानचा सम्राट म्हणून वासिष्ठीपुत्र पुलुमावीचा (ग्रीक: सिरिस्तोलेमयोस, अर्थात श्री पुलुमायी) उल्लेख केलेला आहे[
ब्रिटिश संग्रहालयात असलेले वासिष्ठीपुत्र पुलुमावीचे चांदीचे नाणे

संपूर्ण महागाथा मराठाशाहीची भाग ९४

 

संपूर्ण महागाथा मराठाशाहीची
संग्राहक ::विनोद जाधव





भाग ९४
सातवाहन आणि नाणेघाटातील शिलालेख
पोस्तसांभार :: जयंत कुलकर्णी
आपल्यापैकी अनेकजण नाणे घाटात मुक्काम टाकतात. दरीतून वरती येणारे ढग कवेत घेतात, शूद्ध हवा छातीत भरून घेतात आणि त्या गुहेतल्या पवित्र आणि गुढ अशा वातावरणात निस्तब्ध होतात. त्या गुहेच्या दारात उभे राहून मग आपण खालून रस्त्याने येणार्या व्यापारांचा काफिला नजरे समोर आणू लागतो. दमलेले, तहानलेले ते जीव हळू हळू वर येत असतात आणि वर आल्यावर विश्रांतीसाठी आपली पथारी सोडतात, जेवणाचे डबे उघडतात आणि थंड पाणी पिऊन तृप्त होतात. सुखदु:खाच्या दोन गोष्टी बोलून पुढच्या मार्गाक्रमणाबद्द्ल चर्चा करतात. जकात रांजणात टाकून पुढची वाट धरतात. तेवढ्यात गार वार्याच्या स्पर्शाने आपण भानावर येतो आणि गुहेत शिरतो.
आपण त्या गुहेतल्या भिंतींवर असलेले लेखन बघून हे किती जूने आहे याबद्दल अचंबित होतो. मी जेव्हा लहानपणी, माझ्या आजोबांबरोबर (१९६५) या गुहेत मुक्काम ठोकला होता, तेव्हा या गुहेतल्या मूर्तीसुद्धा शाबूत होत्या. आपल्यातीलच कोणीतरी मग हळूच माहिती पुरवतो “ हे सातवाहन काळातील आहे” म्हणजे हे खूपच जुने आहे एवढेच आपल्याला समजते पण हे काय लिहीले आहे, याचे महत्व काय, हे आपल्याला ना त्यावेळी कोणी सांगू शकत आणि ना आपण त्याच्या मागे लागत कारण आपण परत आपल्या दैनंदिन कामात बुडून जातो. असो पण पुढच्यावेळी आपण नाणे घाटात त्या गुहेत मुक्काम ठोकलात तर आपल्याला असे वाटायची गरज नाही. आपल्यासाठी मी त्या शिलालेखाचे भाषांतर आणि थोडीफार माहीती देत आहे
या लिखाणात एकूण २० लेख आहेत. त्यातला शेवटचा नंतर लिहीलेला आहे. अगोदर हा शिलालेख किती जुना असावा याचा उहापोह करावा लागेल. शातवाहनांना पुराणात आंध्र असेही म्हटलेले आहे. आता हा आंध्र प्रदेश म्हणजे सध्याचा आंध्र प्रदेश असावा का ? याबद्दल काही विद्वानांचे असे म्हणणे आहे की हे राजे आंध्र मावळातले होते म्हणून त्यांचे असे नामकरण झाले. त्यांची सत्ता नंतर आंध्रात पसरलीही होती. पण ते मुळचे आंध्र मावळातले म्हणून ते आंध्र. मला स्वत:ला हेच बरोबर वाटते. कारण आंध्र मावळ म्हणून जो प्रांत ओळखला जातो तो या भागाला बराच जवळचा आहे.
सातवाहनांना प्राकृताचा व वैदिक धर्माचा भयंकर आभिमाम ! त्यांना स्वत:ला संस्कृत उत्तम येत असतानासुद्धा जनतेची लिपी म्हणून त्यांनी सर्व लेख प्राकृतात कोरवले. यांच्याच कुळात एक हाल नावाचा राजा होऊन गेला त्याने त्याच्या विशाल राज्यात दवंडी पिटवली की हालराजा एक काव्यसंग्रह संपादित करत आहे त्यासाठी सर्व नागरिकांनी काव्य पाठवावे. जे प्रचंड काव्य जमा झाले त्यातून गाथासप्तशती तयार झाली. श्री जोगळेकरांनी (कानाला हात लावण्याची स्माईली) या काव्यसंग्रहातून काय काय अर्थ काढता येतात याचे अतिउत्कृष्ठ उदाहरण त्यांच्या “ हाल सातवाहनाची गाथा सप्तशती या ग्रंथात घालून दिले आहे. या ग्रंथातले काव्य सामन्यजनांनी लिहिले असल्यामुळे त्याकाळातले समाज जीवन कसे होते यावर बराच प्रकाश त्यांनी टाकला आहे. तो वाचण्यासारखा आहे. त्यातून मी ही बराच अर्थ काढून ठेवला आहे पण तो परत कधीतरी. त्यातील दोन तीन कविता येथे देतो. त्या काळात म्हणजे जवळजवळ २२०० वर्षापूर्वी गावाकडे स्त्री पुरूषांमधे संबध फारच मोकळेपणाचे असत, त्यामुळे बर्याच गाथांमधे शृंगारीक वर्णने आढळतात. त्यामुळे नंतरच्या काळात झाले काय, ही गाथा एक फालतू काहीतरी शृंगारिक काव्य आहे असे विद्वान धर्ममार्तंडांचे म्हणणे पडले. खरे तर त्या समाजाचा ही गाथा म्हणजे आरसा आहे हे त्यावेळेस उमगले नाही. असो. आपण त्यातील काही काव्य बघूया व नंतर नाणेघाटातील लेख.
दुईक्ज्जाअण्णण्पडिरोहं मा करेहिइ इमं ति ।
उत्थंघेइ व तुरिअं तिस्सा कण्णुप्पलं पुलओ ॥
अर्थ : निरोप सांगणार्या सखीने प्रियकराचा निरोप सांगितला तेव्हा तिची काया रोमांचित झाली. त्यामुळे तिने कानावर खोवलेले कमळ जरा हलले. जणू काही त्या निरोपाच्या आड येऊ नये म्हणून ते बाजूला झाले.
उवहारिआइ समां पिंडारे उअ ! कहं कुणतम्मि ।
णववहुआइ सरोसं सव्व च्चिअ वछाआ मुक्का ॥
गवळ्याच्या घरी गवळण गाईंचे दुध काढायला आली आहे. गवळीबूवा तिच्याशी गुलू गुलू बोलताना बघून त्याच्या पत्नीला एवढा राग आला की तिने बांधलेली सर्व वासरे सोडून दिली. त्यामुळे तेथे एकच गोंधळ माजला आणि गवळीबुवांना गुपचुप गप्पा आवरत्या घ्यायला लागल्या. 🙂
पज्जालिऊण अग्गिं मुहेण पुत्तिए ! किणो समोसरसि ।
थणालसप्डिअपडिमा फुरंति ण छिवंती ते जाला ॥
हे सुंदरी तू फुंकर घातलीस आणि बघ तो अग्नी एकदम प्रज्वलित झाला. पण त्याने तुला एवढे दचकायचे कारण नाही. त्या ज्वाला जरी हालत आहेत, पण त्याने तुला काहीच अपाय होणार नाहीत. घाबरू नकोस तुझ्या उरोजावर पडली आहेत ती त्या ज्वाळांची प्रतिबिंबेच आहेत.
असो. हे थोडेसे विषयांतर झाले. यावर एकदा केव्हातरी लिहेन, पण ते फार मोठे होईल म्हणून तो विचार लांबणीवर टाकतो.
आता शिलालेख -
ओम्‌ नमो प्रजापति - प्रजापतिला नमस्कार असो.
नो धंमस नमो ईदस संकंसन वासुदेवानं चंदसूतानं - नमस्कार धर्माला, इंद्राला, संकर्षण वासुदेव यांना आणि चंद्रसूर्यांना !
..मा..अतानं – महिमावतांना
चतुंनं चं लोकपालानं यमवरून कुबेर वासवा - चारही लोकपालांना म्हणजे यम, वरूण, कुबेर, वासव
नंनमो – यांना नमस्कार.
कुमार-वरस वेदिसिरिस र..ओ – कुमारवर राजा वेदिश्री याची.
.....ईरस सूरस अप्रतिहतचकस दखि – वीराची शूराची अप्रतिहतकाची आणि दक्षिणपथाच्या
नापठ पतिनो – पतिची
मा....लाय – आईचा बालेचा
महारठिनो अंगिय-कुलवधनस सगरगिरिवर – महारठिचा अंगियकुलवर्धनाचा सागर आणि गिरिश्रेष्ठ यांनी वेढा घातलेल्या पृथ्वीच्या प्रथमविरांचा. ( हे वर्णन बघा . कसा आहे हा राजा ? तर हा महारथि अंगकुलाचा आहे. आणि ज्या पृथ्वीला सागर आणि डोंगरांनी वेढा घातलेला आहे अशा या पृथ्वीचा तो प्रथमवीर ( सगळ्यात शूर) आहे.
य व अलह....... सलसुर्य महतो मह......- अर्थ लागत नाही.
.....सिरिस भारिया देवस पुत्रदस वरदस – श्रीची भार्या देवाची पुत्रदाची, वरदाची
कामदस धनदस – कामदाची व धनदाची
वेदसिरि-मातू सतिनो सिरिमतस च मातुय – वेदसिरी आई शक्ती श्रीमान आई
सीम.....- सीम
पथमय ..... पुढे वाचता येत नाही...
५.
वरिय ......आ – अर्थ लागत नाही
नागवरद्यिनिय मासोपवासिनिय गह- - वंदनीय अशा नागश्रेष्ठ स्त्रीचे महिनाभर उपास
तापसाय चरित ब्रह्मचरियाय दिखव्रतयणं सुंडाय – गृहतापसीचे ब्रह्मचर्याचे आचरण ज्याने केले, दिक्षा, व्रत, यज्ञ यात कुशल आहे तिचे,
यणा हुता धूपनसुगंधानिय... – यज्ञात धूप सुगंध जिने हुत केले आहेत तिचे......
रायस यणेहि यिठं वनो – राजाचे यज्ञाने येथे ...
अगाधेय यंणो द्खिना दिना गावो बारस – अगाधेय यज्ञ. दक्षिणा दिली. गाई बारा.
असो च १ – अश्व १.
अनारभनियो यंणो दखिना धेनु – अन्वारंभणी यज्ञ दक्षिणा धेनु
..........दखिनायोदिना गावो १७०० हथी १० – दक्षिणेसाठी दिल्या गाई १७०० हत्ती १०
......स....ससतरय (ण) आसलठि २८९ – ससतरय यज्ञ आसलठि (?) २८९
कुब हियो रुपामयियो १७....भि..... – रुप्याची १७....
...रिको यंणो दखिनायो दिना गावो ११००० – पुंडरिक यज्ञ दक्षिणा दिली गाई ११०००
असा १००० पस.... – अश्व १००० प्रसर्पक....
१०
.....१२ गमवरो १ दखिना काहापना २४४०० – १२ गमवर १, दक्षिणा कार्षापण २४४००
पसपको काहापना ६००१ राज सूय यंणो - प्रसर्पकास काषार्पण ६००१, राजसूय यज्ञ...
.....सकट – (शकट) गाडी.
११
धंणगिरीतंसपयुतं सपटो १ असो १ असरयो – धान्यगिरी.....युक्त, वस्त्र, १ अश्व, १ अश्वरथ
१ गावीनं १०० – गाई १००
असमेधोबितियो यि ठो दखिनायो – दुसरा (पहिल्या नंतरचा) अश्वमेध येथे दक्षिणेसाठी दिले
ना असो रुपाल रो १, सुवंन....नि १२, - रुप्याचे अलंकार १, सोन्याचा नि.... १२
दखिना दिना काहापना ४००० गामो १ – दक्षिणा दिली कार्षापण ४०००, गाई १
हठि ....ना दिना – हत्ती दक्षिणा दिली.
१२
गावो... सकटं धणगिरीतम् समयुतं – गाई....शकट धान्यगिरी.....युक्त
१३
......१७ अच...न ....लय.... – १७ अच...न..
पसपको दिनो...दखिना दिना सु.. – प्रसर्पकास दिली दक्षिणा १२ सुपीनी
पीनी १२ तेस.
रूप आलं करो १ दखिना काहाप(ना) १००००.....२ – त्यास रुप्याचे दागिने १ व रुपये १००००,....२
१४
...गावो २०००० (भग)ल. – गाई २०,००० भगल.
दसरतो यज्ञ यू(इठो दखिना दि)ना गावो १०,००१ – दशरात्र यज्ञ द्क्षिणा दिली गाई १०००१.
गर्गतिरात्र यंणो यिठो दखिना... पसपको पटा ३०१ – गर्गतिरात्र यज्ञ जेथे दक्षिणा....प्रसर्पकास दिलेली वस्त्रे ३०१
गवामयनं यंणो यिठो (दखिना दिना) गावो ११०१ – गवामयन यज्ञ जेथे दक्षिणा दिली गाई ११०१
गावो ११०० पसपको काहापना पटा १००, १०० अतुयामो यंणो – गाई ११००, प्रसर्पक रुपये, वस्त्रे १०० आप्तोर्याम यज्ञ.
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...(ग)वामयन यंणो दखिना दिना गाओ ११०१ – गवामयन यज्ञ दक्षिणा दिली गाई ११०१
अंगिरस (आ)मयनं यंणो यिठो दखिनो गावो ११०१ – अंगिरसामयन यज्ञ दक्षिणा दिली गाई ११०१
त....(दखिना ह) इना गावो ११०१ – (बहुतेक) दक्षिणायन यज्ञ गाई ११०१
सतातिरतं यंणो....१०० – सत्रातिरात्र यज्ञ....१००...
...(यं)णो दखिना ग आ नो ११०० अंगिरस (ति)रतो – यज्ञ दक्षिणा गाई ११०० अंगिरसातिरात्र.
यंणो यिठो दखि..ना.. गावो १००१ – यज्ञ दक्षिणा दिली गाई १००१.
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....गवो १००२ – गाई १००२
छंदोमप (व) मा (नतिरतो) दखिना गावो १००१ – छंदोमपवमान्तिरात्र दक्षिणा गाई १००१
अंग (इ) र (सतिर) तो यं (णो यि) ठो द(खिना) – अंगिरसातिरात्र यज्ञ जेथे दक्षिणा......
...रतो यिठो यंणो दखिना दिना – रात्र जेथे यज्ञ दक्षिणा.....
तो यंणा यिठो दखिना - ..त्र.. यज्ञ जेथे दक्षिणा.
यंणो यिठो दखिना दिना गावो १००१ – यज्ञ दिली दक्षिणा गाई १००१
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...न सयं... – अर्थ लागत नाही
दखिना दिनो गावो...त.... – दक्षिणा दिली गाई...त...
(अं)गि(रसा)मयनं छवस ...(दखि)ना दिनो गावो १००० – अंगिरसामयन उत्सवाच्या दक्षिणा दिल्या गाई १०००
....दखिना दिना गावो १००१ तेरस....अ – द्क्षिणा दिलि गाई १००१ आणि तेराशे...अ
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....तेरसतो स... आग दिखना दिना गावो.....- तेराशे स... आग दक्षिणा दिली गाई....
दसरतो म(दि) ना गावो १००१ उ..... – दशरात्र म(रव) दिल्या गाई १००१
.....१००१ द – १००१ द
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.....यंणो दखिना दि(ना)----- यज्ञ दक्षिणा दिली...
२०
.....दखिना दिना – दक्षिणा दिली
राया सिमुक-सात वाहनो सिरिमातो – राजा सिमुक शातवाहन श्रीमान याचा.
देवि नायनिकाय रणो च सिर सातकनिनो. – देवी नायनिका राजा श्री शातकर्णी इचा.
कुमारो भाय....- कुमार भाय....
महारथि त्र्यणकयिरो – महारथि त्र्यणकयिर
कुमरो हकुसिरि.- कुमार हकुसिरि
कुमारो सातवाहनो- कुमार सातवाहन.
नंतर कोरलेला –
सोपारकस गोविंददास्स्स देयधम पोढि – सोपारकर गोविंददास याचा दानधर्म असलेली ही पाणयोपी ( पाणपोयी)
त्या काळात प्रजापति हा एक महत्चाचा देव असावा असे दिसते कारण त्याला पहिल्यांदा वंदन केले आहे. नंतर धर्माला म्हणजे महाभारतातला धर्मराज का “धर्म” याला हे कळत नाही. पण वेदकालीन देवतांना म्हणजे इंद्राला, यमाला, सूर्याला, चंद्राला, महिमावतांना, वरूण, कुबेर, व महाभारतकालिन कृष्णालाही वंदन केले आहे.
सातवाहनांना दक्षिणपथाचा राजा असे संबोधले आहे. याचा अर्थ दक्षिण दिशेच्या प्रदेशाचा राजा. या राज्याला सिमारेषा नाहीत. ते अवाढव्य आहे.
महारठिचा अंगियकुलवर्धनाचा ? हे अंगकुलातील होते काय हे शोधून काड्।आवे लागेल. तसे असेल तर हे नागवंशीय कसे हे ही बघावे लागेल.
आईला श्री म्हणायची ही पद्धत कधी लोप पावली कोणास ठाऊक.
पुंडरिक यज्ञ हा मोठा असावा, ज्यात ११००० गाई आणि घोडे १००० दान दिले गेले. या यज्ञाबद्दल काही माहिती मिळत नाही.
राजसूय यज्ञामधे गाडी घोडा दान द्यायची रीत असावी. तसेच त्याकाळी सुद्धा वर काहीतरी १/२/३ असे जास्त द्यायची पद्धत होती हे समजते.
अश्वमेध यज्ञात रथ आणि घोडा दान देण्यात येई. तर गाडी भरून धान्य देण्यात येई असे दिसते. असल्या महत्वाच्या यज्ञातच सोने दान केले जाई. त्या काळात हत्तीही मुबलक होते असे दिसते.
सातवाहन हे नागकुलातील असावेत म्हणून नागश्रेष्ठ असे म्हटले असावे. हुता हा शब्द आहूती ज्यातून आला तो असावा. म्हणजे यज्ञात सुगंधित धूपाची आहूती दिली आहे. म्हणजे २२०० वर्षापूर्वी धूप होता. धूप हा तयार करावा लागतो झाडापासून.
धेनू व गाई यातील फरक काय माहीत नाही.
रूपे आणि त्याची भांडी ही मला वाटते समुद्रामार्गे येत असावीत. त्याची दानधर्मात संख्या फारच कमी आहे. ते सहज मिळत नसावेत म्हणूनच महाग असावीत.
असा अर्थ बराच काढता येतो. बघा काढून ! हा एक यज्ञ लेख आहे त्यामुळे त्यात १८ प्रकारचे यज्ञांचा उल्लेख केला आहे. तुर्तास इतकेच पूरे.
जयंत कुलकर्णी.

संपूर्ण महागाथा मराठाशाहीची भाग ९३

 

संपूर्ण महागाथा मराठाशाहीची
संग्राहक ::विनोद जाधव


भाग ९३
सातवाहन आणि पश्चिमी क्षत्रप - राजकीय संघर्ष
पोस्तसांभार :: मिसळपाव
भाग
पुळुवामीनंतर गौतमीपुत्र श्रीयज्ञसातकर्णी हा गादीवर आला. हा सुद्धा स्वतःच्या नावापुढे गौतमीपुत्र असे बिरुद लावत असे. हा शेवटचा महाप्रतापी सातवाहन सम्राट. याने अपरान्ताचा गमावलेला प्रदेश पुन्हा एकदा रूद्रदामनाच्या वंशजांकडून जिंकून घेतला व सातवाहन राज्ये पुन्हा एकदा कळसास पोचवले. ह्याने सत्तावीस वर्षे राज्य केले व आपली सत्ता पश्चिमसमुद्रापासून पूर्वसागरापासून प्रस्थापित केली. विदिशा व काठेवाडापर्यंतही त्याचा अंमल असावा असे काही तेथे सापडलेल्या यज्ञ सातकर्णीच्या नाण्यांवरून दिसते. पुळुवामी आणि यज्ञसातकर्णीने शिडाच्या जहाजांची मुद्रा असलेली नाणी पाडली होती यावरून त्यांचे समुद्रावरचे प्रभुत्त्व सिद्ध होते.
वासिष्ठिपुत्र सातकर्णीचे शिडाच्या जहाजाची मुद्रा असलेले नाणे
श्री यज्ञ सातकर्णीनंतर मात्र सातवाहनांच्या साम्राज्याच्या र्हासाला प्रारंभ झाला. सातवाहनांची सामंत घराणी प्रबळ होत जाऊन त्यांनी पैठणची सातवाहनांची केंद्रिय सत्ता झुगारून दिली. व्यापारही बंद पडू लागल्याने सातवाहन साम्राज्य कमजोर होत गेले. उत्तरेत इशवदात (ईश्वरदत्त) महाक्षत्रपाने शके १५१ (सन. २२९) मध्ये पश्चिम महाराष्ट्रात सातवाहनांचा पाडाव करून सत्ता बळकावली. ह्या ईश्वरदत्ताने सुमारे २० वर्षे राज्य केले असावे. इस. २५० मध्ये पुन्हा एकदा राज्यक्रांती होऊन आभीरवंशीय ईश्वरसेनाने क्षत्रपांचा पराजय करून उत्तर-पश्चिम महाराष्ट्रात आपले राज्य स्थापन केले. याच्या आधीच इस. २३० मध्ये विदर्भातही सातवाहनांची सत्ता संपुष्टात येऊन मुंडवशीयांनी आपले राज्य स्थापन केले व सातवाहन पूर्णतः दक्षिणेत (आंध्रात) ढकलेले गेले व दक्षिणेतही थोडक्याच कालावधीत त्यांचा इक्ष्वाकूवंशी शतमूलाने पाडाव केला व सातवाहन सत्ता पूर्णपणे लयास गेली.
गुजरात, काठेवाड, माळवा ह्या पश्चिमेकडच्या प्रदेशात मात्र पश्चिमी क्षत्रपांचा अंमल गुप्तांच्या राजवटीपर्यंत चालू राहिला. समुद्रगुप्ताने विदिशेपर्यंत गुप्त साम्राज्य स्थापन केले व त्याच्या पुढे चंद्रगुप्ताने वाकाटक नृपतीची मदत घेऊन तृतीय रूद्रसिंह क्षत्रप याचे राज्य अनुमाने सन ३९५ मध्ये संपूर्णतः खालसा केले व क्षत्रपांच्या भरुकच्छ (भडोच) या राजधानीवर कब्जा केला व अशा तर्हेने जवळजवळ संपूर्ण उत्तर भारत आपल्या साम्राज्यात आणला व तत्पुर्वी खाली दक्षिणेत सातवाहनांची राजवट संपूर्ण नष्ट होऊन लहान लहान प्रांतिक राज्ये निर्माण होऊन दक्षिण भारताचा चेहरामोहरा बदलला.
अशा तर्हेने एक वैभवशाली राज्य समाप्त झाले. सातवाहनांनी विस्तृत प्रदेशात केवळ दिर्घकाळ राज्य केले इतकेच नव्हे तर स्थापत्य, कला, साहित्य, संस्कृती, शिल्प, चित्रकला यातही संस्मरणीय अशी प्रगती केली. व्यापारास उत्तेजन देऊन जनतेस सुखी, समृद्ध केले आणि परकियांशी प्राणपणाने लढून आपले गमावलेले राज्य परत मिळविले व मातृभूमीस स्वतंत्र केले. याकाळात सातवाहनांची सतत क्षत्रपांबरोबर लहानमोठी युद्धे होत राहिली. प्रदेश मिळवावे लागले, गमवावे लागले. इ.स.पू. २३० ते इ.स. २३० ह्या प्रदीर्घ कालावधीत त्यांनी महाराष्ट्र देशी तसेच आंध्रातही सत्ता टिकवून धरली व महाराष्ट्राचे पहिले स्वतंत्र ज्ञात राज्यकर्ते झाले. ह्या सातवाहनांनीच सह्याद्रीत बांधलेल्या बहुतांश किल्ल्यांचा वापर गुप्तांनी,चालुक्यांनी, राष्ट्रकूटांनी, शिलाहारांनी व नंतर यादवांनी केला तसेच अधिक किल्ले बनवून भरही घातली. यादवसत्तेच्या पाडावानंतर इस्लामी राज्यकर्त्यांनी मात्र हे किल्ले, येथील प्रदेश आपल्या साम्राज्यात आणिला पण पुढे ह्याच सह्याद्रीच्या एका सातवाहननिर्मीत शिवनेरी नामक दुर्गावर छ्त्रपती शिवाजी महाराजांचा जन्म झाला व पुढे ह्याच किल्ल्यांच्या सहाय्याने तसेच नवे किल्ले उभारून महाराष्ट्राला पुन्हा स्वराज्याचे दिवस दाखवले. असे सातवाहनांचे मोठे ऋण इये देशी आहे.

संपूर्ण महागाथा मराठाशाहीची भाग १०४

  संपूर्ण महागाथा मराठाशाहीची संग्राहक ::विनोद जाधव भाग १०४ कौं ‍ डिण्यपूर (Kaundinyapur) पोस्तसांभार :: प्रणीता हरड भारतातील एक पुरातत्त्वी...